Posted by: RAJ | March 18, 2010

DEKHA HAI!

देखा है, उन भुझी हुई आखो में बस्ते हुए सपनो को ।
जो आज भी अपनी कोशीश से, अपने सपनो में वो पर लागा सके।

देखा है उस प्यास से थर थराथे हुए होठो को ।
जो आज भी अपनी कोशीश से,झुका दे वो आसमान जो उसकी प्यास भुझा सके ।

देखा है उन थके हुए कान्धों को ।
जो आज भी अपनी कोशीश से, धरती के सीने से हरा सोना निकाल सके ।

देखा है उन मटमैलेये पैरो को
जो आज भी अपनी कोशीश से, दौड रहे है ताकी अपनी मन्जिल पा सके ।

अब देखना है अपने अन्दर के उस इन्सान को
जो आज भी अपनी कोशीश से अपने व्यक्तित्तव को जोड सके ।


Responses

  1. inspirational….

  2. humne bhi dekha aaj…aapke ander ke kavi ko…

  3. The last lines are very nice…and overall it speaks your heart out…:)

  4. really Gud one! can u write something for me?

    • Surely will write some day …


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